Thursday, April 30, 2020

हे चन्दा आय बिसरल किया बेर

(आजु हमर पोता दर्श के जन्मदिन छैन्ह .......हुनका चन्दा मामा वाला गीत सब बड़ पसिंद पडैत छैन्ह ................कतबो कानैत  रहैत छथि गाना सुनतहि चुप्प भs जायत छथि .ई चन्दा मामा केर गीत हुनके लेल हुनकर पहिल जन्मदिन पर।)

"हे चन्दा आय बिसरल किया बेर"

हे चन्दा आय बिसरल किया बेर, हे चन्दा केलहुं बहुत अबेर
बौआ हमर बाट तकैत छथि 
नहि बुझियौ आब सबेर 
हे चन्दा ....................

छवि हुनके मुखचन्द्र समायल, जे हमरो छथि बिसेस 
हे चन्दा, उतरू जाहि छी भेष, 
हे चन्दा कानल बौआ अनेर, 
हे चन्दा….................

चन्दा मामा दूर रहथि किया, कहथि ओ हमरा घेरि 
नहि जायथि हमरा छोरि 
जा कहियौन नहि करथि ओ देर
हे चन्दा........................

रुसल दर्श हम कोना मनायब, कहियौ नहि एक बेर 
हे चन्दा, नहि हँसथि छथि मुंह फेर 
हे उगियौ हेतय आब सबेर 
हे चन्दा...............................

कान्ह भिजल आ मोन बेकल अछि, नहि देखैत छथि एको बेर
हे कहथि, दाइ नहि किछुओ लेब
नहि मानथि मामा के बेर
हे चन्दा ................................

-कुसुम ठाकुर-


http://www.youtube.com/watch?v=VdYgbcjRO_k&feature=youtu.be

जन्म भूमि आय मोन परल

(अमेरिका प्रवास के दौरान पहिल बेर जहिया हम सुनहुं जे ओहि ठाम लोक के अपन कब्र के लेल सेहो स्वयं पाई जमा करय परैत छैक तs  कैक  दिन तक हम ओहि विषय में  सोचैत रहि गेलहुँ  . इ कविता ओहि सोच केर उपज अछि. इ कविता हम अप्रवासी भारतीय के ध्यान में राखैत लिखने छी. कविता के माध्यम सs हम ओहि अप्रवासी भारतीय के मनोदशा के कहय चाहैत छियैक जे स्वदेश वापस लौटय चाहय छथि मुदा किछु परिस्थिति वश नहि लौट सकैत छथि।)

"जन्म भूमि आय मोन परल"

जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

कही कोना अछि ह्रदय समायल 
मजबूरी किछु सुझि नहीं पायल
मुदा आय फिसलि यदि  जायब
खसलहुं तs  फेर उठि नहि पायब
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

मजबूरी, वश छोरय परल छल 
चकाचौंध तs  सते बहुत छल
मुदा आब हम मझधार में छी
एक  दिस खद्धा दोसर दिस मौत
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

बचेने रही धरोहर में छोरब
मुदा कफ़न अपन सेहो जोरब
गज भरि जमीन ज्यों ओहि ठाम मांगी
संभव जौं होइत कहितहुँ ठानि
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

सांस बसल अछि जाहि जमीन पर
अँखि जौं मुनि तs तृप्त गंगा जल पर
संभव की होयत से तs  नहि जानि
ली जनम फेर ओहि जमीन पर, तैं
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

-कुसुम ठाकुर-

Wednesday, April 29, 2020

अछि दुर्दशा

"अछि दुर्दशा"

कवि महान 
पर्व त मनेलहुं 
सौंसे ढिंढोरा 

फोटो त छल 
कोना में हेरायल 
अछि दुर्दशा 

पाग दुपटा 
नहि जानथि मोल 
मंच आसीन 

चंदा भेटल 
व्यवस्थापक हम 
त बूझत के 

ढर्रा बनल 
किया बदलि हम  
अछि बहाना 

लाखक खर्च 
नहि अछि उद्देश्य 
होय कल्याण 

नेता  ज्यों वक्ता 
संस्कृतिक उत्थान  
होयत कोना  

-कुसुम ठाकुर- 

शिष्य देखल

"शिष्य देखल "

विद्वान छथि  
ओ शिष्य कहाबथि  
छथि विनम्र 

गुरु हुनक 
सौभाग्य हमर ई 
ओ भेंटलथि

इच्छा हुनक 
बनल छी माध्यम
तरि जायब 

भरोस छैन्ह 
छी हमर प्रयास
परिणाम की ?

भाषा प्रेमक 
नहि उदाहरण 
छथि व्यक्तित्व 

छैन्ह उद्गार
देखल उपासक  
नहि उपमा 

कहथि नहि
विवेकपूर्ण छथि 
उत्तम लोक  

सामर्थ्य छैन्ह 
प्रोत्साहन अद्भुत 
हुलसगर

प्रयास करि 
उत्तम फल भेंटs 
तs कोन हानि 

सेवा करथि 
गंगाक उपासक 
छथि सलिल 

- कुसुम ठाकुर -





मैथिली विरोधी

बिहारक चुनाव जँ जँ लग आयल जा रहल अछि सरगर्मी बढी रहल अछि ......कथिक सरगर्मी से तs हम आ समूचा देशक लोक बूझि रहल छथि. नेतागण आरोप प्रत्यारोप एक दोसर पर तेना लगा रहल छथि जेना आशीर्वाद  हो . लेखा जोखा भs रहल अछि मुदा अपन कार्यक नहि....दोसर नेता की नहि केलाह ताहि केर . जनता केर बुझाबय के प्रयास में कोनो तरहक कोताही कियैक छोड़ताह . सूतल नेता सब जागि गेलाह अछि . अपन भरि कार्यकाल मद में मस्त छलथि, बटोरय सs फुर्सत कहाँ छलैन्ह जे ओ सब जनताक सुख दुःख के विषय में सोचितथि.

आब जाहि पर नोन मिरचाई छिरकने छलाह ताहि लहरि केर कम करबाक प्रयास केनाई तs उचिते. जाहि प्रमंडल केर नाम मात्र उगाही करबाक प्रयोजन के लेल भेल होयतैंह ताहि ठाम जा अपन उपस्थिति दर्ज तs करबे करताह..... आ.. वाह रे जनता.

 आजु कतहु हम पढ़य छलहुँ जे कोनो कांग्रेसी नेताक बयान छलैन्ह "नितीश जी मैथिली विरोधी छथि .......चुनाव लग आबि देखि नितीश जी के मैथिली आ विद्यापति याद आबि गेलैन्ह. यदि ई नहि तs मैथिली के सिलेबस सs कियैक हटेलाह". हम ओहि नेता सँ सहमति छी..... नितीश जी मैथिली विरोधी छथि ......ओ मात्र चुनाव लग देखि इ सब देखेबाक लेल कs रहल छथि ........जनता केर अपना पक्ष में करबाक लेल कs रहल छथि. मुदा ओ कांग्रेसी नेता की इ बिसरि गेलाह जे आजु मैथिली भाषाक इ दशा ख़ास कs बिहार में कियैक छैक ? काग्रेसी नेता के जँ मैथिली सँ प्रेम रहितियेंह तs आजु मैथिली बिहारक द्वितीय भाषा रहितियैक . मुदा ओहि समय में मुख्यमंत्री जी वोट लेल मैथिली केर बलि देने छलाह आ आजु नितीश जी के वोटक लेल मैथिली आ विद्यापति के याद आबि गेलैन्ह तs एहि में कोन पैघ गप्प भs गेलैक.

मैथिली आ विद्यापति जहिना नितीश जी के लेल हथियार छैन्ह तहिना ओहि समय में पदासीन मुख्यमंत्री जी के लेल छलैन्ह आ जे मंत्री आजु नितीश जी पर आरोप लगा रहल छथि हुनको लेल . सब अपन अपन स्वार्थ मात्र के लेल . चाहे ओ नितीश जी होइथ वा कोनो आओर नेता ........चाहे ओ हुनका मैथिली सs प्रेम होउक वा नहि होउक ताहि सs की .

मुदा इ सोचनीय विषय अवशय अछि जे लुप्त भेल जारहल एहि समृद्ध भाषा केर कोना बचायल जाय? जाहि भाषा आ विद्वानक प्रतिष्ठा सौंसे अछि जाहि भाषाक अपन व्याकरण अछि अपन इतिहास अछि ओकरा कोना बचायल जाय ? की हमारा लोकनिक कोनो कर्त्तव्य नहि.......मात्र नेता के कोसैत रहि आ हाथ पर हाथ धरि बैसल रहि ?

लुप्त कहला पर किछु लोक केर आपत्ति होयतैंह ......इ हम जानैत छी ....मुदा हमारा हिसाबे मैथिली लुप्त प्राय जेना छैक. कियैक नहि ओकरा अष्ठम सूची में स्थान भेट गेल हो.

एक प्रयास

" एक प्रयास "

हाइकु छैक  
विधा सरल तैयो
रचि ज्यों पाबि  

हमरा लेल 
गर्वक गप्प बस 
हमहू  जानि 

नहि बुझल 
इ विधाक लिखब
कोन आखर 

सलिल जीक 
इ मार्ग प्रदर्शन 
भेटल जानी 

मोन प्रसन्न 
भेटल नव विधा 
छी तैयो शिष्या

डेग बढ़ल 
सोचि नहि छोरब  
ज्यों दी आशीष 

- कुसुम ठाकुर -

अहिंक धीया

संस्कृत साहित्य में सहस्त्रों वर्षों पूर्व त्रिपदिक छंद रचे गए जिनमें गायत्री तथा ककुप प्रसिद्ध हैं. हाइकु मूलतः त्रिपदिक (तीन पदों अर्थात पंक्तियों का ) जापानी छंद है. जापान में इस छंद में प्राकृतिक छटा का वर्णन करने की परंपरा है किन्तु हिन्दी में हाइकु किसी विशेष विषय तक सीमित नहीं है. गीता का हाइकु में अनुवाद हुआ है. हाइकु गीत और ग़ज़ल लिखे गए हैं. हाइकु में खंड काव्य भी है. हाइकु में पंक्तियाँ केवल ३ होती हैं. पहली पंक्ति में ५ अक्षर होते हैं, दूसरी पंक्ति में ७ तथा तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर होते हैं.  मूलतः  तो संस्कृत की देन है जो जापान जाकर फिर नया रूप लेकर भारत में आयी कविन्द्र रविन्द्र नाथ जी तथा कुछ अन्य कवि इसे जापान से भारत में लाये तथा इसमें लिखा.हाइकु में अक्षर या वर्ण गिनते  समय लघु या दीर्घ  मात्र में अंतर न कर दोनों को एक माना जाता है. संयुक्त अक्षर (क्त, द्य, क्ष आदि) भी एक ही गिने जाते हैं. जापान में कई अन्य त्रिपदी छंद स्नैर्यु आदि भी हैं.

हाइकु के शिल्प के सम्बन्ध में एक बात और हाइकु में पदों की तुक के बारे में पूरी छूट है. तुक मिलाना जरूरी नहीं है. हिन्दी कविता में सरसता तथा गेयताजनित माधुर्य की परंपरा है, किन्तु केवल समर्थ कवि ही तुक में लिख पाते हैं.

इस दृष्टि से हाइकु के ५ प्रकार हो सकते हैं: १. तुक विहीन, २. पहले-दूसरे पद की तुक समान हो, ३. पहले-तीसरे पद की तुक समान हो, ४. दूसरे-तीसरे पद की तुक समान हो, ५. तीनों पदों की तुक समान हो.


इ हमर पहिल हाइकु अछि जाहि केर श्रेय आचार्य श्री संजीव वर्मा"सलिल" के जाइत छैन्ह . हुनके प्रोत्साहन पर आइ हम अपन पहिल हाइकु लिखलहुं  अछि .

"अहिंक धीया"

आस बनल 
अछि अहाँक अम्बे
हम टूगर

ध्यान धरब
हम कोना आ नहि
सूझे तइयो 

पाप बहुत 
हम कयने छी हे 
अहिंक धीया

जायब कत
आब नहि सूझय
करू उद्धार 

- कुसुम ठाकुर-
  

हे चन्दा आय बिसरल किया बेर"

  (आजु हमर पोता दर्श के जन्मदिन छैन्ह .......हुनका चन्दा मामा वाला गीत सब बड़ पसिंद पडैत छैन्ह ................कतबो कानैत  रहैत छथि गाना सुन...